नर्मदा नदी - एक परिचय

नदियों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। नदियां हमारे लिए वरदान तथा जीवनदायिनी हैं। देश के आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास में प्राचीनकाल से ही नदियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। नदियों की घाटियों में ही विश्व की प्राचीन सभ्यताओं का उदय हुआ है। आज भी देश की सर्वाधिक जनसंख्या एवं कृषि का संकेन्द्रण नदी घाटी क्षेत्रों में ही पाया जाता है। प्राचीन काल में व्यापारिक एवं यातायात की सुविधा के कारण देश के अधिकांश नगर नदियों के किनारे ही विकसित हुए थे तथा आज भी देश के लगभग सभी व्यावसायिक एवं धार्मिक स्थल किसी न किसी नदी से सम्बद्ध हैं। नदियों के महत्व के कारण ही प्राचीन काल से देश में चार नदियों को चार वेदों के रूप में माना गया है। गंगा को ऋग्वेद, यमुना को यजुर्वेद, सरस्वती को अथर्ववेद और नर्मदा को सामदेव।

एक अनुमान के अनुसार देश की सबसे प्राचीन नदी नर्मदा है। यह देश के मध्य भाग में पूरब से पश्चिम की ओर बहने वाली मध्यप्रदेश और गुजरात राज्य में बहने वाली एक प्रमुख नदी है, जो इन प्रदेशों में गंगा नदी के समान पूज्यनीय है। नर्मदा नदी पूरे भारत की प्रमुख नदियों में से एक ही है जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है। ऐसी मान्यता है कि इसका अवतरण लगभग चार से छ: करोड़ वर्ष पूर्व क्रिटेशियस युग के पहले सतपुड़ा विंध्याचल पर्वत श्रेणी से आने वाली जलधाराओं का वहन करने वाली धारा नर्मदा के रूप में हुआ। भू-वैज्ञानिक दृष्टि से नर्मदा नदी घाटी 60 से 250 करोड़ वर्ष पुरानी है। इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ बंजार, शेर, शक्कर, तवा, गंजाल और छोटा तवा आदि हैं, जो क्रमश: मंडला, नरसिंहपुर एवं होशंगाबाद जिले में नर्मदा से मिलती हैं। नर्मदा देश की पांचवी बड़ी नदी मानी जाती है तथा इसे मध्यप्रदेश की जीवन-रेखा कहा जाता है।

नर्मदा नदी समुद्र तल से 3000 फीट की ऊँचाई पर स्थित अमरकंटक नामक स्थान के एक कुंड से निकलती है। यह कुंड मंदिरों के समूहों से घिरा है। अनूपपुर जिले में 40 मील बहने के बाद यह मंडला की ओर बहती है। मंडला के बाद उत्तर की ओर एक सँकरा चाप बनाती हुई यह जबलपुर की ओर मुड़ जाती है। इसके बाद 30 फीट ऊँचे धुँआधार नामक प्रपात को पार कर यह दो मील तक एक सकरे मार्ग से होकर बहने के बाद जलोढ़ मिट्टी के उर्वर मैदान में प्रवेश करती है, जिसे नर्मदा घाटी कहते हैं। यह घाटी विंध्य और सतपुड़ा पहाड़ियों के मध्य में स्थित है। जबलपुर और होशंगाबाद के बीच इसके किनारे 40 फीट तक ऊँचे हैं। इसी बीच में एक 340 फीट ऊँचा प्रपात भी है। पहाड़ियों से बाहर आने के बाद पुन: यह एक खुले मैदान में प्रवेश करती है। इसी स्थान पर आगे ओंकारेश्वर एवं महेश्वर नामक नगर इसके किनारे बसे हैं। यहाँ उत्तरी किनारे पर कई मंदिर, महल एवं स्नान घाट बने हुए हैं। अमरकंटक की पहाडि़यों से निकलकर नर्मदा छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर करीब 1310 किलोमीटर का प्रवाह पथ तय कर भरूच के आगे खंभात की खाडी़ में विलीन हो जाती है। नर्मदा नदी का प्रवाह क्षेत्र लगभग 36000 वर्ग मील है।

रामायण तथा महाभारत और परवर्ती ग्रंथों में नर्मदा नदी के विषय में अनेक उल्लेख हैं। पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार नर्मदा की एक नहर किसी सोमवंशी राजा ने निकाली थी जिससे उसका नाम सोमोद्भवा भी पड़ गया था। गुप्तकालीन अमरकोश में भी नर्मदा को सोमोद्भवा कहा है। कालिदास ने भी नर्मदा को सोमप्रभा कहा है। रघुवंश में नर्मदा का उल्लेख है। मेघदूत में रेवा या नर्मदा का सुन्दर वर्णन है। वाल्मीकि रामायण में भी नर्मदा का उल्लेख है। इसके पश्चात के श्लोकों में नर्मदा का एक युवती नारी के रूप में सुंदर वर्णन है। महाभारत में नर्मदा को ॠक्षपर्वत से उद्भूत माना गया है। भीष्मपर्व में नर्मदा का गोदावरी के साथ उल्लेख है। श्रीमद्भागवत में रेवा और नर्मदा दोनों का ही एक स्थान पर उल्लेख है। कहीं-कहीं साहित्य में इस नदी के पूर्वी या पहाड़ी भाग को रेवा शाब्दिक अर्थ (उछलने कूदने वाली) और पश्चिमी या मैदानी भाग को नर्मदा शाब्दिक अर्थ (नर्म या सुख देने वाली) कहा गया है किन्तु महाभारत के उपर्युक्त उद्धरण में उदगम के निकट ही नदी को नर्मदा नाम से अभिहित किया गया है।

मत्स्य पुराण, पद्म पुराण, कूर्म पुराण में नर्मदा की महत्ता एवं उसके तीर्थों का वर्णन है। मत्स्य पुराण एवं पद्म पुराण आदि में ऐसा आया है कि नर्मदा के उदगम स्थल से समागम तक 10 करोड़ तीर्थ हैं। अग्नि पुराण एवं कूर्म पुराण के अनुसार 60 करोड़ एवं 60 सहस्र तीर्थ हैं। नारदीय पुराण का कथन है कि नर्मदा के दोनों तटों पर 40 मुख्य तीर्थ हैं। वन पर्व ने नर्मदा का उल्लेख गोदावरी एवं दक्षिण की अन्य नदियों के साथ किया है। तीनों लोकों के सभी तीर्थ यहाँ नर्मदा में स्नान करने को आते हैं। मत्स्य पुराण एवं पद्म पुराण ने उद्घोष किया है कि नर्मदा सभी स्थानों में पवित्र है। नर्मदा केवल दर्शन मात्र से पवित्र कर देती है। सरस्वती (तीन दिनों में) तीन स्नानों से, यमुना सात दिनों के स्नानों से और गंगा केवल एक स्नान से पवित्र कर देती है।

विष्णु धर्मसूत्र ने श्राद्ध के योग्य तीर्थों की सूची में नर्मदा के सभी स्थलों को श्राद्ध के योग्य माना है। नर्मदा को रुद्र के शरीर से निकली हुई कहा गया है, जो इस बात का कवित्वमय प्रकटीकरण मात्र है कि यह अमरकंटक से निकली है जो महेश्वर एवं उनकी पत्नी का निवास स्थल कहा जाता है। वायु पुराण में ऐसा उद्घोषित है कि नदियों में श्रेष्ठ पुनीत नर्मदा पितरों की पुत्री है और इसके तटों पर किया गया श्राद्ध अक्षय होता है। मत्स्य पुराण एवं कूर्म पुराण का कथन है कि यह 100 योजन लम्बी एवं दो योजन चौड़ी है तथा अमरकंटक से निकली है, जो कलिंग देश का पश्चिमी भाग है। कूर्म पुराण एवं मत्स्य पुराण में ऐसा कहा गया है कि जो अग्नि या जल में प्रवेश करके या उपवास करके नर्मदा के किसी तीर्थ पर या अमरकंटक पर प्राण त्यागता है वह पुन: इस संसार में नहीं आता। विष्णु पुराण में कहा गया है कि प्रात:काल और रात्रि में नर्मदा को नमस्कार, हे नर्मदा, तुम्हें नमस्कार, मुझे विषधर साँपों से बचाओ इस मन्त्र का जप करके चलता है तो उसे साँपों का भय नहीं होता।

भारत की अनेक धार्मिक अवधारणाओं में नर्मदा नदी को देवी के रूप में निरुपित किया गया है। नर्मदा नदी को भारत की पवित्र नदियों में से एक माना जाता है। पवित्र नदी नर्मदा के तट पर अनेक तीर्थ हैं, जहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। इनमें कपिलधारा, शुक्लतीर्थ, मांधाता, भेड़ाघाट, शूलपाणि, भरूच उल्लेखनीय हैं। नर्मदा के तट पर बहुत से उपतीर्थ भी हैं जिनमे प्रमुख हैं, महेश्वर तीर्थ अर्थात् ओंकारद्ध शुक्ल तीर्थ, भृगुतीर्थ, जामदग्न्य तीर्थ, जहाँ नर्मदा समुद्र में गिरती है। मरने के बाद लोग नर्मदा में अपनी राख विसर्जित करना मोक्ष प्राप्ति के लिये आवश्यक समझते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग नर्मदा के किनारे ही प्राण विसर्जन या अंतिम संस्कार की इच्छा भी रखते हैं। इसके घाटों पर लोग पूजा अर्चना करते हैं और ध्यान लगाते हैं। अनेक पर्वों और उत्सवों का नर्मदा से सीधा संबंध है। इसके तटों पर अनेक प्रसिद्ध मेलों का आयोजन किया जाता है और अनेक प्रसिद्ध मंदिर नर्मदा के तट पर ही बने हुए हैं। परंपरा के अनुसार नर्मदा की परिक्रमा का प्रावधान है, जिससे श्रद्धालुओं को पुण्य की प्राप्ति होती है। विश्व में हर शिव मंदिर में इसी दिव्य नदी के नर्मदेश्वर शिवलिंग विराजमान हैं। दूसरे पाषाण से निर्मित शिवलिंग भी स्थापित किये जा सकते हैं परन्तु उनकी प्राण प्रतिष्ठा अनिवार्य है। जबकि श्री नर्मदेश्वर शिवलिंग बिना प्राण प्रतिष्ठा के पूजित हैं।

नर्मदा नदी मध्य प्रदेश में अमरकंटक से लेकर सोंडवा तक विशाल भू-भाग को सींचती है, यह प्रदेश की प्राकृतिक संपदा ही नहीं अपितु जन जन की भावनात्मक आस्था का आधार भी है। अपने प्रवाह क्षेत्र में यह अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती है। सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण नर्मदा नदी का यह मैदान अपनी घनी जनसंख्या के कारण भी जाना जाता है। इस नदी में मछलियों की अनेक प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यह कृषि, पर्यटन तथा उद्योगों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है तथा अपने तट पर बसे शहरों की पेयजलापूर्ति भी करती है। इसके तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विशेष अंग हैं। इसके ऊपर बने पुल, बाँध और नदी परियोजनाएँ प्रदेश की बिजली, पानी और कृषि से संबंधित ज़रूरतों को पूरा करती हैं।

नर्मदा अपनी सहायक नदियों सहित प्रदेश के बहुत बड़े क्षेत्र के लिए सिंचाई का बारहमासी स्रोत है। नर्मदा नदी के तटीय क्षेत्रों में उगाई जाने वाली फसलों में मुख्यतः धान, गन्ना, दाल, तिलहन, आलू, गेहूँ एवं कपास हैं, जो देश व प्रदेश की खाद्यान व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। नदी में मत्स्य उद्योग भी बहुत जोरों पर चलता है। नर्मदा का महत्त्व पर्यटन पर आधारित आय के कारण भी है। इसके तट पर ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तथा प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर कई पर्यटन स्थल हैं, जो प्रदेश की आय का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। नर्मदा तट पर धार्मिक स्थलों के कारण यहाँ श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या निरंतर बनी रहती है और धार्मिक पर्यटन में महत्त्वपूर्ण योगदान करती है। इस तरह प्रदेश के आर्थिक विकास में नर्मदा नदी की अहम् भूमिका है।

नर्मदा नदी प्रदेश की जीवनदायिनी नदी है। सामाजिक, आर्थिक, पौराणिक एवं धार्मिक रूप से अति महत्वपूर्ण होने के बाद भी नर्मदा नदी बड़ी तेजी से प्रदूषित हो रही है। यदि समय रहते प्रदूषण के स्त्रोतों पर रोक नहीं लगाईं गयी और इसके संरक्षण के लिए प्रयास नहीं किये गये तो नर्मदा नदी के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगेगा और मनुष्य के जीवन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। जिस प्रकार मनुष्य का स्वास्थ्य उसके आस-पास के वातावरण से प्रभावित होता है उसी प्रकार नदी का स्वास्थ्य भी उसके आस-पास के वातावरण पर निर्भर होता है। इसलिए नर्मदा नदी के संरक्षण हेतु नदी के आस-पास के वातावरण को स्वच्छ एवं प्रदूषणमुक्त रखना अत्यंत आवश्यक है। परिषद् द्वारा करवाए गये सर्वेक्षण के अनुसार नर्मदा नदी के तट पर बसे नगरों और बड़े गांवों के पास के लगभग 100 नाले नर्मदा नदी में मिलते हैं और इन नालों में प्रदूषित जल के साथ-साथ शहर का गंदा पानी भी बहकर नदी में मिल जाता है, इससे नर्मदा जल प्रदूषित हो रहा है। राज्य में नर्मदा प्रवाह के 16 ज़िले ऐसे हैं, जिनके गंदे नालों का प्रदूषित पानी नर्मदा में प्रदूषण के स्तर को बढ़ा रहा है। इसके अलावा पहाड़ी क्षेत्र के कटाव से भी नर्मदा में प्रदूषण बढ़ रहा है। कुल मिलाकर नर्मदा में 102 नालों का गंदा पानी और ठोस मल पदार्थ प्रतिदिन बहाया जाता है, जिससे अनेक स्थानों पर नर्मदा जल भयावह रूप से प्रदूषित हो रहा है। होशंगाबाद में 29 नाले हैं, मंडला में 16 और जबलपुर ज़िले में 12 बड़े नाले हैं, जो नर्मदा को प्रदूषित कर रहे हैं। इनके अलावा खंडवा, बड़वानी और अनूपपुर ज़िलों में नौ-नौ, खरगौन में सात, डिंडौरी में छह और रायसेन ज़िले में पांच नाले नर्मदा को प्रदूषित करते हैं। गंदे पानी और ठोस मल पदार्थों के अलावा रसायनिक उर्वरक और कीटनाशकों का पानी भी नर्मदा में बहाया जाता है। नर्मदा कछार में अब पहले जैसा वनक्षेत्र नहीं रह गया है और कृषि क्षेत्र में लगातार वृद्धि हो रही है। लाभकारी खेती के लिए किसान कई प्रकार के रसायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग करते हैं। एक फसल के दौरान पांच से सात बार सिंचाई भी होती है। इसके बाद भी खाद और कीटनाशकों के घातक रसायन खेत की मिट्‌टी में घुल-मिल जाते हैं, जो वर्षाकाल में पानी के साथ बहकर नर्मदा नदी में मिलते हैं और इससे प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है। वन क्षेत्रों में कमी के कारण मिट्टी और मुलायम चट्टानों में कटाव से भी नदी में जमाव बढ़ रहा है और प्रदूषण फैल रहा है। अमरकंटक और ओंकारेश्वर सहित कई स्थानों पर नर्मदा जल का स्तर क्षारीयता पानी में क्लोराईड और घुलनशील कार्बन डाईऑक्साइड का आंकलन करने से कई स्थानों पर जल घातक रूप से प्रदूषित पाया गया। भारतीय मानक संस्थान ने पेयजल में पीएच 6.5 से 8.5 तक का स्तर तय किया है लेकिन अमरकंटक से दाहोद तक नर्मदा में पीएच स्तर 9.02 तक दर्ज किया गया है। इससे स्पष्ट है कि नर्मदा जल बड़ी तेजी से प्रदूषित हो रहा है। जनसंख्या बढ़ने, कृषि तथा उद्योग की गतिविधियों के विकास और विस्तार से जलस्त्रोतों पर भारी दबाव पड़ रहा है। गर्मी के मौसम में मध्य प्रदेश में नर्मदा तट के ही कई गांव और शहरों में भीषण जल संकट की स्थिति निर्मित हो जाती है। ऐसे में नर्मदा जल को प्रदूषण से बचाने के उपाय गंभीरता से करने की आवश्यकता है तथा इस कार्य में सरकार के साथ-साथ समाज एवं संतों को भी बराबरी से योगदान देना होगा।

नर्मदा परिक्रमा संबंधी बैठक दिनांक 16/11/2009 में माननीय मुख्यमंत्री जी द्वारा निर्देश दिये गये थे कि नर्मदा परिक्रमावासियों हेतु नर्मदा नदी के दोनों तटों पर स्थित पैदल परिक्रमा पथ को सुविधायुक्त बनाया जाए। इस हेतु प्रदेश के अनूपपुर जिले के अमरकंटक से झाबुआ जिले के सोंडवा विकासखण्ड तक नर्मदा नदी के दोनों तटों का पूर्ण सर्वेक्षण किया जाये, जिससे कि पथ हेतु मार्ग, विश्राम स्थल व अन्य सुविधाओं को चिन्हांकित किया जा सके। निर्देश के परिपालन में जन अभियान परिषद द्वारा दिनांक 02 से 10 जनवरी 2010 तक नर्मदा प्रवाह के कुल 16 जिलों के 51 विकासखण्डों में नर्मदा पथ के दोनों तटों का अनूपपुर जिले के अमरकंटक से झाबुआ जिले के सोंडवा विकासखण्ड तक का सर्वेक्षण 171 पैदल यात्रियों (समन्वयकों) को भेजकर पूर्ण कराया गया। सर्वेक्षण के दौरान निम्न बिंदुओं पर जानकारी एकत्र की गई-

  • नर्मदा के किनारे स्थित परपंरागत मार्ग की स्थिति।
  • आने वाले गांव का व उनकी नर्मदा तट से दूरी।
  • जंगल की स्थिति घना/छोटे जंगल/वीरान।
  • मुख्य नदी से मिलने वाले नाले व नदियों के नाम, लंबाई, चैड़ाई (औसत)।
  • रात्रि आवास हेतु आश्रम, धर्मशालाएं, मंदिरों की स्थिति व नाम, भवन स्वामी/व्यवस्थापक प्रमुख के नाम, पता व दूरभाष क्रमांक।
  • नदी के किनारे कटाव की स्थिति।
  • नदी के किनारे आने वाले घाटों के नाम बड़े, छोटे, कच्चे।
  • नर्मदा सेवा में सक्रिय नागरिकों के, संस्थाओं के नाम, पते तथा दूरभाष क्रमांक।
  • परिक्रमा पथ पर कराये जाने वाले विकास कार्यों का स्थलवार चिन्हांकन।
  • नोटः- चूंकि यह सर्वेक्षण वर्ष 2010 में करवाया गया था। अतः वर्तमान में तथ्यों एवं आंकड़ों में कुछ भिन्नता हो सकती है। आपके जिले के नर्मदा प्रवाह के विकासखण्डों से संबंधित सर्वेक्षण की जानकारी निम्नानुसार है- उपरोक्त नक़्शे के अनुसार आपके जिले में नर्मदा नदी का परिदृश्य नर्मदा कुण्ड, गाँव, मंदिर, आश्रम, सहायक नदी, नाले, परंपरागत मार्ग, नदी की सीमाएं, जंगल, पहाड़ी, सड़क आदि संकेतकों के आधार पर परिलक्षित हो रहा है। दिनांक 26 अगस्त 2014 को आयोजित म. प्र. जन अभियान परिषद की बैठक में माननीय मुख्यमंत्री जी द्वारा परिषद को समाज को जोड़ते हुए नदियों के संरक्षण एवं पुनर्जीवन कार्य को प्राथमिकता से करने हेतु निर्देश दिये गये। साथ ही अन्य बैठकों में भी माननीय मुख्यमंत्री जी द्वारा परिषद को समय-समय पर नदी संरक्षण एवं पुनर्जीवन हेतु कार्य करने के निर्देश दिये जाते रहे हैं। अतः आपके जिले में नर्मदा नदी के संरक्षण एवं पुनर्जीवन कार्य को प्राथमिकता से करें तथा इस कार्य हेतु स्थानीय स्तर पर सरकार, समाज तथा स्वैच्छिक संगठनों के साथ रणनीति बनाकर कार्य करें।

    अन्य लिंक